अलविदा
मैं चल रहा था राहों में अकेले ,
फिर अचानक कुछ लोग आ मिले .
पहले तो चेरे पहचानने में दिक्कत ,
फिर सबको अपना मानने में दिक्कत.
सफ़ेद रूमाल था जैसे मैं ,
अब सब रंगों से सराबोर हो गया .
अब जो रहे अलग होने को है ,
अलग होने का दिल नहीं करता .
चाहे जितनी कोशिश कर लूं ,
गाढ़ा जो रंग होता है छूटा नहीं करता .
अब छोड़ रहा हूँ ,हाथ जो सबके ,
ये हाथ तो आसानी से छूट रहा है .
अजीब सा है कुछ ,जो दिख नहीं रहा है ,
मगर मैं महसूस करता हूँ , कुछ है अन्दर जो टूट रहा है .
मैंने सिर्फ हाथ मिलाए थे ,न जाने कैसे दिल जुड़ गए हैं .
राह में कुछ लोग मिले थे ,
आज सबके राह मुड़ गए हैं . : मोनेश कुमार गजेन्द्र